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चंद्रहिया गांधी स्मारक: जहाँ गांधी ने अन्यायपूर्ण आदेश का विरोध किया

चंद्रहिया गांधी स्मारक
फोटो: चम्पारण लाइव संग्रह

चम्पारण सत्याग्रह के इतिहास में चंद्रहिया का नाम विशेष महत्व रखता है। मोतिहारी के निकट स्थित यह स्थान उस घटना से जुड़ा है, जिसने अप्रैल 1917 में महात्मा गांधी के किसान आंदोलन को निर्णायक मोड़ दिया। यहाँ गांधी को ब्रिटिश प्रशासन का आदेश मिला था कि वे चम्पारण छोड़ दें। गांधी ने किसानों की पीड़ा समझने का अपना दायित्व अधिक महत्वपूर्ण माना और आदेश का पालन करने से इनकार कर दिया।

15 अप्रैल 1917 को गांधी मोतिहारी पहुँचे। उन्हें जसौलीपट्टी क्षेत्र में नील की खेती करने वाले किसानों की कठिनाइयों की सूचना मिली थी। अगले दिन, 16 अप्रैल को वे किसानों से मिलने निकले। चंद्रहिया के पास पुलिस अधिकारी ने उन्हें रोका और जिला छोड़ने का आदेश दिया। गांधी मोतिहारी लौटे, लेकिन चम्पारण से जाने के बजाय उन्होंने अपने निर्णय की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार की।

18 अप्रैल 1917 को गांधी मोतिहारी की अदालत में उपस्थित हुए। बड़ी संख्या में स्थानीय लोग अदालत के आसपास जमा हुए। यह घटना भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सत्याग्रह की एक महत्वपूर्ण मिसाल बनी। गांधी ने हिंसा के बजाय खुले रूप से असहमति जताई और दंड भुगतने की तत्परता दिखाई।

चंद्रहिया की महत्ता किसी विशाल भवन में नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक निर्णय में है जिसने किसानों को साहस दिया। आज यहाँ का गांधी स्मारक चम्पारण सत्याग्रह के शुरुआती चरण की स्मृति सँजोता है। इतिहास के विद्यार्थी, शोधार्थी और गांधी के विचारों में रुचि रखने वाले लोग इस स्थल को मोतिहारी के गांधी संग्रहालय के साथ देख सकते हैं।

चंद्रहिया मोतिहारी से कुछ किलोमीटर की दूरी पर है। स्थानीय वाहन से पहुँचना सुविधाजनक है। स्मारक के भ्रमण से पहले परिसर की उपलब्धता और स्थानीय व्यवस्था की पुष्टि करना उचित है।

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