भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में चम्पारण का नाम महात्मा गांधी के पहले बड़े भारतीय सत्याग्रह के कारण दर्ज है। लेकिन इस इतिहास की शुरुआत गांधी से नहीं, बल्कि चम्पारण के एक ऐसे किसान से होती है जिसने अपने इलाके के किसानों की पीड़ा को राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुँचाने का निश्चय किया था। उस किसान का नाम था राजकुमार शुक्ल। गांधी चम्पारण में केंद्रीय व्यक्तित्व बने, लेकिन उन्हें वहाँ लाने के पीछे शुक्ल की दूरदृष्टि, कर्मठता और निर्भीकता थी।
1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे मोहनदास करमचंद गांधी देश की परिस्थितियों को समझ रहे थे। दक्षिण अफ्रीका में वे सत्याग्रह का प्रयोग कर चुके थे, लेकिन भारत की ग्रामीण समस्याओं का प्रत्यक्ष अनुभव उन्हें अभी प्राप्त करना था। दूसरी तरफ बिहार के चम्पारण में नील की खेती से जुड़े किसानों की स्थिति लंबे समय से कठिन थी। अंग्रेज नील उत्पादकों और बागान मालिकों की आर्थिक शक्ति के सामने किसान कमजोर थे।
चम्पारण में नील की खेती केवल कृषि का प्रश्न नहीं थी। वह भूमि, लगान, श्रम और सत्ता के असमान संबंधों से जुड़ी थी। तीनकठिया व्यवस्था में किसानों को अपनी जमीन के बीस हिस्सों में से तीन हिस्सों पर नील उगाने के लिए बाध्य किया जाता था। खेती की शर्तों और आर्थिक वसूली के कारण किसान अपनी भूमि के उपयोग के बारे में स्वतंत्र निर्णय नहीं कर पाते थे। कृत्रिम रंगों के विस्तार से प्राकृतिक नील की मांग प्रभावित होने लगी, तब भी किसानों पर आर्थिक दबाव के नए रूप सामने आए।
राजकुमार शुक्ल उन्हीं किसानों में थे जिन्होंने नील की व्यवस्था की मार झेली थी। वे किसी राष्ट्रीय राजनीतिक दल के बड़े पदाधिकारी नहीं थे। उनकी ताकत उनका अनुभव, किसानों के प्रति प्रतिबद्धता और अपनी बात को सही जगह तक पहुँचाने की समझ थी। वे जानते थे कि केवल स्थानीय शिकायतें करते रहने से इस अन्याय का समाधान कठिन होगा। इसलिए उन्होंने किसानों की समस्या को राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुँचाने का रास्ता चुना।
दिसंबर 1916 में लखनऊ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। राजकुमार शुक्ल भी चम्पारण की समस्या लेकर वहाँ पहुँचे। यहीं उनकी मुलाकात गांधी से हुई। गांधी ने अपनी आत्मकथा के ‘नील का दाग’ प्रसंग में इसका विवरण दिया है। शुक्ल ने उनसे चम्पारण आने का आग्रह किया और ब्रजकिशोर प्रसाद से परिचय कराया। ब्रजकिशोर प्रसाद बिहार के प्रतिष्ठित वकील थे और आगे चलकर गांधी के महत्वपूर्ण सहयोगी बने।
गांधी तत्काल चम्पारण जाने को तैयार नहीं हुए। उनका कहना था कि किसानों की स्थिति अपनी आँखों से देखे बिना वे कोई राय नहीं दे सकते। उन्होंने कांग्रेस में प्रस्ताव रखने का सुझाव दिया। ब्रजकिशोर प्रसाद ने चम्पारण के किसानों के प्रति सहानुभूति का प्रस्ताव रखा और वह पारित भी हुआ। राजकुमार शुक्ल इस उपलब्धि से संतुष्ट नहीं हुए। उन्हें केवल कांग्रेस का प्रस्ताव नहीं, गांधी की प्रत्यक्ष उपस्थिति चाहिए थी।
यहीं राजकुमार शुक्ल की दूरदृष्टि दिखाई देती है। उन्होंने यह समझा कि यदि गांधी स्वयं चम्पारण की परिस्थितियाँ देखेंगे तो किसानों की शिकायतों को एक अलग गंभीरता मिलेगी। शुक्ल के मन में पहले से कोई विस्तृत राजनीतिक रणनीति थी, ऐसा कहने के लिए हमारे पास पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। लेकिन उनके लगातार किए गए कार्य यह अवश्य बताते हैं कि वे स्थानीय संघर्ष को व्यापक ध्यान दिलाने के महत्व को पहचानते थे।
लखनऊ के बाद गांधी कानपुर गए तो शुक्ल भी वहाँ पहुँचे। गांधी आश्रम लौटे तो शुक्ल ने वहाँ भी जाकर उनसे मिलने की कोशिश की। उनका आग्रह नहीं बदला। गांधी के अपने कार्यक्रम थे और वे तुरंत यात्रा तय नहीं करना चाहते थे, लेकिन शुक्ल बार-बार उन्हें चम्पारण आने के लिए कहते रहे। इस निरंतरता में उनकी कर्मठता दिखाई देती है।
गांधी ने अंततः शुक्ल से कहा कि वे कलकत्ता में उनसे मिलें। वहाँ से यात्रा का कार्यक्रम बनाया जाएगा। शुक्ल गांधी के पहुँचने से पहले ही कलकत्ता में उपस्थित थे। गांधी ने आत्मकथा में स्वीकार किया कि उस समय वे चम्पारण की भौगोलिक स्थिति और नील की खेती की कठिनाइयों से बहुत कम परिचित थे। एक स्थानीय किसान उन्हें उस वास्तविकता से परिचित करा रहा था जिसके बारे में वे स्वयं लगभग अनजान थे।
राजकुमार शुक्ल को केवल एक जिद्दी किसान के रूप में याद करना उनके ऐतिहासिक योगदान को सीमित कर देना है। वे दूरदृष्टि वाले, कर्मठ और निर्भीक व्यक्ति थे। उनकी दूरदृष्टि इस बात में थी कि उन्होंने चम्पारण के किसानों की समस्या को स्थानीय शिकायतों से आगे राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुँचाने का रास्ता चुना। उनकी कर्मठता महीनों की यात्राओं और लगातार प्रयासों में दिखाई देती है। उनकी निर्भीकता इस बात में थी कि नील उत्पादकों और औपनिवेशिक सत्ता के प्रभाव वाले इलाके में वे किसानों की आवाज उठाने से पीछे नहीं हटे।
राजकुमार शुक्ल की विशेषता यह भी थी कि वे अपने संघर्ष की सीमाएँ पहचानते थे, लेकिन उन्हें अपनी नियति मानने को तैयार नहीं थे। गांधी को चम्पारण लाने का उनका प्रयास केवल संयोग नहीं था। उनके प्रमाणित कार्यों को देखकर यह कहा जा सकता है कि वे किसानों के संघर्ष को व्यापक आधार देने का रास्ता खोज रहे थे। उन्होंने गांधी से सिर्फ सहानुभूति नहीं माँगी, बल्कि आग्रह किया कि वे अन्याय को अपनी आँखों से देखें।
अप्रैल 1917 में गांधी और राजकुमार शुक्ल कलकत्ता से पटना के लिए रवाना हुए। गांधी की यह पहली पटना यात्रा थी। शुक्ल उन्हें राजेंद्र प्रसाद के निवास पर ले गए, लेकिन राजेंद्र प्रसाद उस समय घर पर नहीं थे। वहाँ के कर्मचारियों ने गांधी को पहचाना नहीं। गांधी ने अपनी आत्मकथा में इस प्रसंग के साथ छुआछूत के उस सामाजिक वातावरण का भी उल्लेख किया है जिसमें कुएँ से पानी लेने और घर की सुविधाओं के उपयोग तक में जातिगत भेदभाव किया जाता था।
पटना में गांधी को समझ में आया कि किसानों की शिकायतों की व्यवस्थित जाँच के लिए स्थानीय सहयोगियों और कानूनी जानकारी की जरूरत होगी। मौलाना मजहरुल हक से संपर्क के बाद वे मुजफ्फरपुर पहुँचे। गांधी हेरिटेज पोर्टल के कालक्रम के अनुसार 10 अप्रैल 1917 की रात मुजफ्फरपुर में प्रोफेसर जे. बी. कृपलानी ने उनका स्वागत किया। यहाँ से किसानों की समस्याओं को समझने की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित रूप लेने लगी।
मुजफ्फरपुर में गांधी ने स्थानीय वकीलों से बातचीत की। वे नील उत्पादकों का पक्ष भी जानना चाहते थे। उनका तरीका केवल शिकायत सुनकर निष्कर्ष निकालने का नहीं था। वे सच्चाई को प्रत्यक्ष जाँच और प्रमाणों के आधार पर समझना चाहते थे। यही दृष्टि आगे चलकर चम्पारण के संघर्ष को एक विशिष्ट स्वरूप देने वाली थी।
यह याद रखना भी जरूरी है कि चम्पारण के किसानों का प्रतिरोध गांधी के आने से अचानक शुरू नहीं हुआ था। नील की खेती और बागान मालिकों के व्यवहार के विरुद्ध स्थानीय असंतोष पहले से था। किसानों की शिकायतों और विरोध की अपनी पृष्ठभूमि थी। राजकुमार शुक्ल इसी पृष्ठभूमि से उभरे। उनका योगदान उस संघर्ष को ऐसे व्यक्ति तक पहुँचाना था जो उसे व्यापक राष्ट्रीय महत्व दिला सके।
15 अप्रैल 1917 को गांधी मोतिहारी पहुँचे। अब किसानों की शिकायतों की प्रत्यक्ष जाँच का अगला चरण शुरू होने वाला था। प्रशासन के लिए यह स्थिति असुविधाजनक थी। दक्षिण अफ्रीका में अन्यायपूर्ण कानूनों के विरुद्ध संघर्ष कर चुका एक व्यक्ति अब चम्पारण में किसानों के बयान सुनना चाहता था। गांधी का ध्यान भाषण देने से अधिक किसानों की वास्तविक परिस्थितियों को जानने पर था।
मोतिहारी पहुँचने के बाद प्रशासन ने गांधी को चम्पारण छोड़ने का आदेश दिया। गांधी ने आदेश मानने से इनकार किया और अदालत में उपस्थित हुए। यह घटना सत्याग्रह का निर्णायक मोड़ बनी, लेकिन उस अदालत और गांधी के वक्तव्य की कहानी अलग आलेख में विस्तार से कही जानी चाहिए।
दिसंबर 1916 में लखनऊ में एक किसान गांधी से मिलता है। गांधी तुरंत उसकी बात नहीं मानते। वह किसान कानपुर जाता है, आश्रम पहुँचता है, कलकत्ता में प्रतीक्षा करता है और अंततः अप्रैल 1917 में गांधी को बिहार लेकर आता है। कुछ महीनों के इस घटनाक्रम में चम्पारण सत्याग्रह की जमीन तैयार हुई।
इतिहास में बड़े आंदोलनों की पहचान अक्सर उनके सबसे प्रसिद्ध नेताओं से होती है। उनके पीछे खड़े स्थानीय व्यक्तित्व धुंधले पड़ जाते हैं। चम्पारण की कहानी इस प्रवृत्ति को सुधारने का अवसर देती है। गांधी ने किसानों के संघर्ष को नई दिशा दी, लेकिन राजकुमार शुक्ल ने गांधी को उस संघर्ष से परिचित कराया। दोनों की भूमिकाएँ अलग थीं और दोनों आवश्यक थीं।
राजकुमार शुक्ल का स्थान इसलिए केवल ‘गांधी को चम्पारण बुलाने वाले किसान’ का नहीं है। वे किसानों की आवाज को राष्ट्रीय मंच तक पहुँचाने वाले दूरदृष्टि संपन्न, कर्मठ और निडर प्रतिनिधि थे। चम्पारण सत्याग्रह के इतिहास को समझने के लिए उनकी स्वतंत्र भूमिका को पहचानना जरूरी है।
